Saturday, 25 April 2020

Bharatendu Harishchandra

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Bharatendu Harishchandra



भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जीवन-परिचय

आधुनिक युग के प्रवर्तक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जन्म 1850 . में काशी के एक सम्पन्न परिवार में हुआ था। काशी के प्रसिद्ध सेठ अमीचन्द के वंशज भारतेन्दु के पिता का नाम बाबू गोपालचन्द्र था, जोगिरिधरदासके नाम से कविता लिखते थे। घरेलू परिस्थितियों एवं समस्याओं के कारण भारतेन्दु की शिक्षा व्यवस्थित रूप से नहीं चल पाई। इन्होंने घर पर ही स्वाध्याय द्वारा हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी, बांग्ला, मराठी आदि भाषाओं की शिक्षा ग्रहण की। इन्होंने कविताएँ लिखने के साथ-साथ कवि-वचन सुधा (1884 बनारस) नामक पत्रिका का प्रकाशन भी आरम्भ किया। बाद में, हरिश्चन्द्र मैग्जीन (1883 बनारस) तथाहरिश्चन्द्र चन्द्रिकाका भी सफल सम्पादन किया। ये साहित्य के क्षेत्र में कवि, नाटककार, इतिहासकार, समालोचक, पत्र-सम्पादक आदि थे, तो समाज एवं राजनीति के क्षेत्र में एक राष्ट्रनेता एवं सच्चे पथ-प्रदर्शक थे। जब राजा शिवप्रसाद को अपनी चाटुकारिता के बदले विदेशी सरकार द्वारा सितारे-हिन्द की पदवी दी गई, तो देश के सुप्रसिद्ध विद्वज्जनों ने इन्हें 1880 . मेंभारतेन्दुविशेषण से विभूषित किया। क्षय रोग से ग्रस्त होने के कारण अल्पायु में ही 1885 . में भारत को यह इन्दु (चन्द्रमा) अस्त हो गया।


साहित्यिक गतिविधियाँ
गयकार के रूप में भारतेन्दु जी को हिन्दी गद्य का जनक माना जाता है। इन्होंने साहित्य को सर्वांगपूर्ण बनाया। काव्य के क्षेत्र में इनकी कृतियों को इनके युग का दर्पण माना जाता है। इनकी निम्नलिखित रचनाएँ उल्लेखनीय हैं।

काव्य कृतियाँ
प्रेम मापुरी, प्रेम तरंग, प्रेम सरोवर, प्रेम मालिका, प्रेम प्रलाप, तन्मय लीला, कृष्ण चरित, दान-लीला, भारत वीरत्व, विजयिनी, विजय पताका आदि रचनाओं के अतिरिक्त उर्दू का स्यापा, नए जमाने की मुकरी आदि भी उल्लेखनीय रचनाएँ हैं।
अन्य कृतियाँ
नाटकवैदिकी हिंसा, हिंसा भवति’, ‘सत्य हरिश्चन्द्र’, ‘श्रीचन्द्रावली’, ‘भारत दुर्दशा’, ‘नीलदेवीऔरअँधेर नगरीआदि नाटकों की रचना भारतेन्दु जी ने की। उपन्यासपूर्ण प्रकाशऔरचन्द्रप्रभा
इतिहास और पुरातत्त्व सम्बन्धी कृतियाँ
कश्मीर कुसुम’, ‘महाराष्ट्र देश का इतिहास’, ‘रामायण का समय’, ‘अग्रवालों की उत्पत्ति’, ‘बूंदी का राजवंशऔरचरितावली देश-प्रेम सम्बन्धी रचनाएँ भारतवीरत्व, ‘विजय-वल्लरी’, ‘विजयिनीएवंविजय-पताकाप्रमुख हैं।
देश-प्रेम सम्बन्धी रचनाएँ
भारत-वीरत्व, ‘विजय-वल्लरी’, ‘विजयिनीएवंविजय-पताकाप्रमुख हैं।
काव्यगत विशेषताएँ
भाव पक्ष
1.        समाज सुधारक भारतेन्दु जी ने काव्य क्षेत्र को आधुनिक विषयों से सम्पन्न किया और रीति की बँधी-बँधाई परिपाटी से कविता को मुक्त कर आधुनिक युग का द्वार खोल दिया। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र कवि होने के साथ-साथ समाज सुधारक एवं प्रचारक भी थे। उन्होंने अपने काव्य में अनेक सामाजिक समस्याओं का चित्रण किया तथा समाज में व्याप्त कुरीतियों पर तीखे व्यंग्य भी किए।
2.        राष्ट्रप्रेम की भावना भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने अपनी सजग राजनीतिक चेतना के फलस्वरूप विदेशी शासन के अत्याचारों से पीड़ित भारतीय जनता में देशभक्ति की भावना एवं राष्ट्रीयता का भाव जगाने का प्रयास किया। उन्होंने अंग्रेजों द्वारा किए गए शोषण के विरुद्ध जनता को सचेत करने का भी प्रयास किया।
3.        सामाजिक दुर्दशा का निरूपण भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने समाज में व्याप्त रूढियों एवं कुप्रथाओं का डटकर विरोध किया। भारतेन्दु जी ने नारी शिक्षा का समर्थन किया तथा विधवा विवाह को प्रोत्साहित किया। वे सती प्रथा, छुआछूत आदि के विरोधी थे। उन्होंने सामाजिक कुरीतियों, धार्मिक पाखण्ड आदि का निरूपण निःसंकोच किया।
4.        भक्ति भावना भारतेन्दु हरिश्चन्द्र कृष्ण के भक्त थे और पुष्टि मार्ग को मानने वाले थे। उनकी कविता में सच्ची भक्ति-भावना के दर्शन होते हैं। ईश्वर के प्रति दृढ विश्वास को व्यक्त करते हुए भारतेन्दु जी अपनी दीनता का उल्लेख करते हैं
उधारौ दीन बन्धु महाराज
जैसे हैं जैसे तुमरे ही नहीं और सौं काज।।।
5.        प्रकृति चित्रण प्रकृति चित्रण करने में भारतेन्दु जी को अधिक सफलता नहीं मिली, क्योंकि वे मान-प्रकृति के शिल्पी थे। यद्यपि भारतेन्दु जी ने वसंत, वर्षा आदि ऋतुओं का मनोहारी चित्रण अपने काव्य में किया है। दूसरी ओर उन्होंने गंगा-यमुना, चाँदनी का सुन्दर चित्रण भी अपने काव्य में किया है।

कला पक्ष
1.        भाषा भारतेन्दु आधुनिक हिन्दी गद्य के प्रवर्तक थे, जिन्होंने खड़ी बोली को आधार बनाया, लेकिन पद्य के सम्बन्ध में ये शिष्ट, सरल एवं माधुर्य से परिपूर्ण ब्रजभाषा का ही प्रयोग करते रहे। इसी क्रम में इन्होंने ब्रजभाषा के परिमार्जन का कार्य किया। कुछ अप्रचलित शब्दों को बाहर करने के अतिरिक्त भाषा के रूविमुक्त रूप को अपनाया। भाषा के निखार के लिए लोकोक्तियों एवं मुहावरों को भी अपनाया। भारतेन्दु ने पद्य की कुछ रचनाएँ खड़ी बोली में भी की।
2.        शैली भारतेन्दु जी की शैली इनके भावों के अनुकूल है। इन्होंने इसमें नवीन प्रयोग करके अपनी मौलिक प्रतिभा का परिचय दिया है। इन्होंने अपने काव्य में चार प्रकार की शैलियों को अपनाया
o          भावात्मक शैली प्रेम एवं भक्ति के पदों में
o          रीतिकालीन अलंकार शैली श्रृंगार के पदों में
o          उद्बोधन शैली देश-प्रेम की कविताओं में
o          व्यंग्यात्मक शैली समाज सुधार सम्बन्धी कविताओं में इन सभी रचनाओं में इन्होंने काव्य-स्वरूप के अन्तर्गत मुक्तक शैली का प्रयोग किया।
3.        छन्द एवं अलंकार भारतेन्दु जी के काव्य में अलंकारों का सहज प्रयोग हुआ है। इन्होंने अपने काव्य में अलंकारों को साधन के रूप में ही अपनाया है, साध्य-रूप में नहीं। भारतेन्दु जी ने मुख्यतः अनुप्रास, उपमा, उत्प्रेक्षा एवं सन्देह अलंकारों को अपने काव्य में अधिक महत्व दिया। कवित्त, सवैया, लावनी, चौपाई, दोहा, छप्पय, गजल, कुण्डलिया आदि छन्दों का प्रयोग इनकी रचनाओं में मिलता है।

हिन्दी साहित्य में स्थान
भारतेन्दु जी में वह प्रतिभा थी, जिसके बल पर ये अपने युग को सच्चा एवं सफल नेतृत्व प्रदान कर सका इनकी काव्य कृतियों को इनके युग का दर्पण कहा जाता है। भारतेन्दु जी की विलक्षण प्रतिभा के कारण ही इनके समकालीन युग को हिन्दी साहित्य मेंभारतेन्दु युगके नाम से जाना जाता है।