Tuesday, 19 May 2020

जड़ की मुस्कान

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जड़ की मुस्कान



1.  निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक जा दो पंक्तियों में दीजिए_



(1) एक दिन तने ने जड़ को क्या कहा?

1.  उत्तर:  एक दिन तने ने जड़ से कहा कि वह तो निषक्य हैl वह जिंदगी से सदा डरी रही है और धरती के अंदर मुंह गड़ाए पड़ी रहती हैl





(2)  जड़ का इतिहास क्या है?
उत्तर:  जड़ का इतिहास यही बताता गया है कि वह धरती के अंदर मुंह गड़ाए रही है और वह निषक्य हैl

(3)  डाली तनी को हीन क्यों समझती है?
3.  उत्तर: डाली तने को हीन इसीलिए समझती है क्योंकि उसे यहां बिठा दिया गया वह वहीं पर ही रहाl इस प्रगतिशील संसार में कभी भी इधर-उधर नहीं लहरायाl खाकर मोटा हो गयाl

(4 पत्तियां दाल की किस कमी की ओर संकेत करती है?
उत्तर:  पत्तियां डाल को कहती है कि उनका क्या कमाल हैl वह झूमि, लहराई परंतु इस धवन प्रधान दुनिया में उन्होंने कभी एक शब्द भी नहीं बोलाl

(5)  फूलों ने पत्तियों की चंचल आता का आधार क्या बताया है?
उत्तर:  फूलों ने पत्तियों की चंचलता का आधार डाली को ही बताया क्योंकि वह उसी के सहारे लहरआती है और हवा में डोलती हैl

(6)  सबकी बातें सुनकर जड़ क्यों मुस्कुराई?
उत्तर:  सबकी बातें सुनकर जड़ मुस्कुरा पड़ती है क्योंकि तना, पत्ते,  डाल, फूल जो अपने को श्रेष्ठ सिद्ध करने में लगे हैं उन सब का जीवन केवल जड़ के कारण ही हैl उन सब की बुनियाद जड़ ही है क्योंकि उसी के कारण उनकी सता हैl

2.  निम्नलिखित पद्यांश की सप्रसंग व्याख्या करें:

(1) एक दिन तने ने भी कहा था,
      जड़?
      जड़ तो जड़ रही है;
      जीवन से सदा डरी रही है,
     और यही है इसका सारा इतिहास
     की जमीन में मुंह गड़ाए पड़ी रही है;

प्रसंग:  प्रस्तुत पंक्तियां हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक 10 में संकलित श्री हरिवंश राय बच्चन की कविता 'जड़ की मुस्कान' में से ली गई हैl इस कविता के माध्यम से कवि व्यक्ति को अपने मूल को सदा याद रखने की प्रेरणा देते हुए कहते हैं कि-

व्याख्या:  इन पंक्तियों में सना अपनी महत्वता सिद्ध करते हुए जड़ को कहता है कि तू तो निषक्य है अर्थात किसी काम की नहीं हैl तू जिंदगी से सदा डरी रही है और इसीलिए तू धरती के अंदर मुंह गड़ाए पड़ी रहती हैंl


(2)  एक दिन फूलों ने भी कहा था, पत्तियां?
        पत्तियां ने क्या किया?
        संख्या के बल पर बस डालों को शाप लिया,
      डालों के बल पर ही चल चपल पड़ रही है,
     हवाओं के बल पर ही मचल रही है
    लेकिन हम अपने से खुले, खुले फूले हैं-
    रंग लिए, रस लिए, पराग लिए-
    हमारी यश गंद दूर-दूर - दूर फैली है,
    भमरो ने आकर हमारे गुण गाए हैं,
    हम पर बराए हैंl

प्रसंग:  प्रस्तुत पंक्तियां हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक 10 में संकलित श्री हरिवंश राय बच्चन की कविता 'जड़ की मुस्कान' में से ली गई हैl इस कविता के माध्यम से कवि व्यक्ति को अपने मूल को सदा याद रखने की प्रेरणा देते हुए कहते हैं कि-

व्याख्या:  फुल अपने आपको पत्तियों से श्रेष्ठ सिद्ध करते हुए हैं कि पत्तियों पर व्यंग करते है कि चाहे पत्तियों ने डालियों को भर दिया परंतु उनका अस्तित्व डाली के कारण ही हैl परंतु वे स्व्यं खिले हैं, फूले हैं, रस भरा है, प्राग लिए है और उनकी यश और सुगंध दूर-दूर तक फैली हैl भवरे आकर उनका गुणगान करते हैं परंतु जड़ उनकी बातें सुनकर मुस्कुरा देती हैl  क्योंकि जड़ को पता है कि इन सब का इतिहास उसके कारण ही हैl परंतु सब अपने घमंड में चूर है और अपने आप को ही श्रेष्ठ सिद्ध करना चाहते हैंl